उम्मीदें विकलांग नहीं हैं

   इलाहाबाद विश्वविद्यालय में स्नातक में प्रवेश के बाद आज क्लास का पहला दिन था । अलग-अलग जिलों व प्रदेशों से आये किशोरों का जमावड़ा लगा था। कक्षाओं के चलने की सारणी नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दी गई थी। सभी छात्र भीड़ में से उचक-उचक कर, अपने सेक्शन की कक्षाओं की टाइमिंग और शिक्षकों के नाम देखने में मशगूल थे। मैं भी उन्हीं छात्रों की भीड़ में से जगह बनाकर एड़ियों के बल खड़े होकर नोटिस बोर्ड को देख रहा था। मैं अपनी कक्षाओं की सूची देखने के बाद छात्रों की भीड़ से टकराते और धकियाते  बाहर आकर खड़ा हुआ। थोड़ी राहत की सांस लेने के बाद थोड़े हिकारत भरी नजरों से मैं नोटिस बोर्ड की ओर लगी भीड़ को देख रहा था। नौजवान किशोरों की भारी तादात के बीच एक अधेड़ चेहरा दिखा जो बिल्कुल मेरी ही तरह भीड़ के ठेलम-ठेल के बीच नोटिस बोर्ड पर नजर टिकाने की कोशिश में था पर बार-बार असफल हो रहा था। कुछ देर उसके चेहरे की बेचैनी देखकर मेरी नज़रें उस पर टिकी रहीं। मुझे लगा इस व्यक्ति को क्या पड़ी है जो बच्चों के बीच फंसकर परेशान हो रहा था। फिलहाल मैंने विश्वविद्यालय की रौनक व बड़े कैम्पस में घूमने की अपनी आकांक्षा को पूरा करना ही प्राथमिक कार्य समझा। इसलिए उस चेहरे की ओर से ध्यान हटाकर मैं कैम्पस के भ्रमण के लिए चल पड़ा।

     विश्वविद्यालय के राजनीतिक माहौल और छात्रों की भारी संख्या ने हम सभी नये छात्रों को अचम्भित किया। कहीं पर भी यदि आठ-दस छात्रनेताओं का समूह  राजनीतिक चर्चा करता दिख जाता तो नव-प्रवेशी छात्र लोहे के छोटे टुकड़ों की भाँति उनके पास खिंचते चले आते थे और उनके बीच होने वाले वार्तालाप को बड़ी दिलचस्पी से सुनते थे। आइसा छात्र संगठन के छात्रनेता गोष्टियाँ लगाकर नये छात्रों के विचारों को जानने के प्रयास में लगे रहते थे। यह एक ऐसा वक्त होता है जब तमाम छात्र संगठन, छात्रों को अपनी विचारधारा से परिचित कराने और संगठन की संख्या मजबूत करने में जुटे रहते हैं। कुछ नये दोस्तों से परिचय के बाद हम सभी विश्वविद्यालय परिसर में घूम-घूम कर इन तमाम हलचलों से वाकिफ होने की कोशिश करते।

     कई महीने इसी तरह कक्षाओं और विश्वविद्यालय परिसर में घूमते-फिरते बीत गए। एक दिन अचानक विश्वविद्यालय में ही फिर वही अधेड़ व्यक्ति दिखा। वो पानी की बॉटल भरकर किसी के लिये ले जा रहा था। मन में कोई विशेष बात तो नहीं पर उसे देखकर एक हैरानी यह जरूर हुई कि उसके चेहरे पर वही बेचैनी आज भी दिख रही थी जो पहले दिन दिखी थी। वो दिखने में लम्बा परन्तु लम्बाई की औसत में तन्दुरुस्त नहीं था। थोड़ा पतला और झुका हुआ। बाल अधिकाँश सफेद। उसकी व्यघ्रता देखकर दिल यह भी नहीं मानने को राजी हो रहा था कि ये किसी विभाग का कर्मचारी होगा। वो व्यक्ति मेरे सामने से ही पानी की बॉटल हाथ में लिए गुजरा और मैं उसे खड़ा होकर देखने लगा। मुझे लगा जरा देखूं तो इसका यहाँ काम क्या रहता है। वो कुछ दूर आगे जाकर एक पेड़ के नीचे लगी बेंच पर लेटे एक लड़के को गले में हाथ डालकर उठाने लगा और फिर उसे पानी पिलाया। पानी पिलाने के बाद उस व्यक्ति ने अपने गले में पड़ी रुमाल के दोनों सिरों को पकड़कर गाँठ लगाई। उस वृताकार रूमाल के घेरे को उस लड़के के कमर में डाला और अपना गर्दन भी उस घेरे में उसने डालकर उसे गोद में उठाकर बाहर की ओर चल पड़ा। मैं ये दृश्य देखकर हैरान था और वो उसे लेकर चला जा रहा था। जिस लड़के को लेकर वो चला जा रहा था वो दरसल विकलांग था। उसके शरीर का अधिकाँश हिस्सा बेजान हो चुका था। पीछे से उस लड़के के शरीर के केवल दो हिस्से दिख रहे थे- एक तरफ उसका बेजान लटकता पैर और दूसरी तरफ उसका सजीव मुस्कुराता चेहरा। वो उसे लेकर चला जा रहा था और मैं खड़ा सोच रहा था कि वो व्यक्ति उस लड़के का पिता है,जो पहले दिन नोटिस बोर्ड में कक्षाओं की सूची झांकता हुआ दिखा था। मैं लगातार सोच में डूबा जा रहा था कि वो लड़का अगर स्वस्थ होता तो शायद मेरी ही तरह परिसर में घूम-घूमकर सारे नये दृश्यों को जीता। उसकी जो भीतरी शक्ति उसे विश्वविद्यालय में पढ़ने के लिए उसे उत्साहित कर रही थी और उसे यहाँ तक ले आई, वो कितनी अपराजेय होगी। काश उस अपराजेय शक्ति के साथ वो दोस्त बनकर हमारे बीच रह पाता। मित्रता की इस थोड़ी सी इच्छा ने मुझे उसकी ओर खींचा और मैं उनके पीछे-पीछे जाने लगा। मैंने देखा वो व्यक्ति उस लड़के को गोद में लेकर सड़क उस पार जा चुका था और रिक्शे पर बैठकर चला गया। उन दोनों के चेहरे मुझे काफी देर तक खींचते रहे। एक,गम्भीर मुद्रा लिए था,दूसरा, मुस्कुराहट। अपनी-अपनी मुद्राओ से वे मुझे झकझोर के चले गए। मैं पूरे दिन इस दृश्य को भूल न पाया। कमरे पर आने पर मैं लगातार अपने तर्कों से उन पिता-पुत्र की आकांक्षाओं के बारे में निर्णय लेने की कोशिश कर रहा था कि आखिर क्या है इन दोनों के मन में जो ये विश्वविद्यालय की ओर आते हैं। मेरे दिल में ये कसक रह-रहकर उठती कि वो पिता अपनी किस आकांक्षा को उस लड़के के माध्यम से पूर्ण करना चाहता है और वो लड़का जिसके शरीर में जान नाम मात्र के लिए है ,वो किस लक्ष्य को पाना चाहता है। क्या वो लड़का उस अधेड़ पिता की चिंताओं को दूर कर पायेगा। इन्ही सवालों में मेरे कई दिन गुजरे।

   हिंदी विभाग के सामने हम कई दोस्त मिलकर बातचीत करते रहते। कक्षाओं के उपरान्त काफी गपशप और जुमलेबाजी होती और सभी ठहाके लगाते। पर कई बार ऐसा हुआ कि उसी वक्त वो व्यक्ति उस लड़के को गोद में लेकर सड़क की ओर जाता हुआ दिख जाता था। हम सभी एक पल को एकदम शांत होकर उसे देखते रहते। जब वो गेट से बाहर की ओर चले जाते तब हम सभी हल्की सांस लेते। ये हम सभी मित्रों की संवेदनशीलता थी कि हम उस लड़के की दशा को देखकर दुःख व्यक्त करते थे, पर हमारी संवेदनशीलता से उनके जीवन में कोई बदलाव सम्भव न था। फिर तो ऐसा अक्सर देखने को मिल जाता था जब वो रिक्शे से उतारकर उसे गोद में उठाकर कक्षा में ले जाता और वापस समय पर लेने जाता।

मुझे याद है मैंने अंतिम उसे बीए फाइनल ईयर की परीक्षाओं के दौरान देखा था जब अप्रैल की गर्मी में वो पिता उसे अपने गोद में उठाकर,सिर पर रूमाल रखे कड़ी धूप में चला आ रहा था। गर्मियों के बीत जाने के बाद जुलाई में हमारे रिजल्ट घोषित हुए और हम सभी प्रथम श्रेणी से पास हुए हम सभी दोस्त बहुत खुश थे। मैंने एम. ए. हिंदी साहित्य से पुनः विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। अगस्त का महीना था। बारिश की झूम-झाम बूंदे बरस रही थी और हम एक दीवार के छज्जे के सहारे खड़े होकर भीगने से बचने की कोशिश कर रहे थे। अचानक रूमाल सर पर डाले वही अधेड़ व्यक्ति आकर मेरे बगल दीवार से सटकर खड़ा हो गया। मैंने उसे पहचान लिया। मुझे लगा शायद आज वो फिर एम.ए की क्लास की सूची देखने आया होगा उस लड़के के लिए। आज चूंकि वो उस लड़के को गोद में लिए नहीं दिखा इसलिए अनायास मैंने पूछ लिया, “आपके साथ जो लड़का रहता था वो दिख नहीं रहा।” उन्होंने बताया कि बीए की परीक्षाओं के कुछ दिनों बाद ही उसके शरीर का जीवित हिस्सा भी निर्जीव हो गया जिससे उसके सारे अंग मृत हो गए और अब वो नहीं रहा। उन्होंने बताया कि बीए के सम्पूर्ण अंको के आधार पर उस लड़के का प्रथम श्रेणी में रिजल्ट आया। जिसके चलते छात्र कल्याण अधिष्ठाता ने उसे विकलांग साइकिल(व्हील चेयर) प्रदान की। वो उस लड़के का अंकपत्र हाथ में लिए हथेलियों से अपना आँसू पोछने लगे। उन्होंने कहा कि, “जब तक जान थी शरीर में ,तब तो मेरे गोद में ही घूमकर पढ़ाई कर चुका और जब उसकी प्रतिभा के दम पर साइकिल मिली तो खुद की हिम्मत से इस दुनिया से चल पड़ा। आज उसे नहीं बल्कि उसका रिजल्ट गोद में ले जा रहा हूँ। मैं अब तक उसका रिजल्ट ही लेकर घूम रहा था। वो तो दरसल कही है ही नहीं। वो विकलांग जरूर था पर उसकी आकांक्षाएं और मेरी उम्मीदें विकलांग नहीं थी।”

  मैं बारिश की बूँदो के साथ भीतर ही भीतर जल रहा था। उस अधेड़ के हाथों में उस नौजवान अंकपत्र को बार-बार झाँक रहा था। मुझे उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा उस अंकपत्र में झलक रहा था जो खुद के पुरुषार्थ से ऊपर की ओर जा चुका था।

                                                                        आशीष कुमार तिवारी

                                                                     पीएचडी

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

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नौकाकार आंखें

बहुत देर से नाव

रस्सी से किनारे बंधी रहकर

लहरों से टकरा रही थी

पानी में पड़े मेरे और तुम्हारे पैर ठंडा चुके थे

 

पर आंखों की तासीर थी कि

मिटने का नाम न ले रही थी

तुम्हारी आंखें भी किन्हीं तरंगों पर सवार थीं

तुम्हारी पुतलियों के किनारे ज़रा-ज़रा सी नमी

चांद की रोशनी में झलक रही थी

 

मैं समझने की कोशिश में था कि

तुम्हारी आँखें और ये नाव

आखिर संकेत क्या कर रही

अचानक नाव की रस्सी  किनारे से छूट गई

तुम्हारी छलछलाती आंखें भी कह बैठी मुझसे

नाव की मंद चाल की ओर इशारा करके…….

 

● आशीषकुमार

कुछ असर है साँसों में जो हवाएँ गुनगुनाने लगीं

तब क्या होगा मौसम में जब तुम्हारी साँसे मिलकर हलचल में होंगी…

पत्रकार के नाम खत

खाली हैं पन्ने
लिखता क्यों नहीं
दुनिया बिक रही
तू भी बिकता क्यों नहीं
देख अगर तेरे कलम की धार
अगर किसी नेता या मंत्री के
नकाब को फाड़ दे तो
तू डरना नहीं
तुझे भले ही जला दिया जाएगा
पर तेरे कलम की धार
अनवरत चलती जायेगी।

आशीष कुमार तिवारी